apna sach

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

अंह;

मै हूँ क्या
जैसे शरीर के ऊपर सिर
वैसे सिर के ऊपर 'मै '
कभी हल्का व
कभी भारी ।

शनिवार, 30 जनवरी 2010

मंचन

कही तो कुछ शेष है ,
हलकी ,धीमी व् शिथिल मंद -मंद
दबी पड़ी कही
अन्दर तक,
कुछ नहीं फिर भी बहुत कुछ शेष है ,

मन में दबी पड़ी ,बचपन की कल्पनाए ,
युवाकाल की प्रतिशोध की भावनाए ,
वर्त्तमान से अजेय रहने की
इच्छाए शेष है ,

शेष है अभी पूर्णता की परिभाषा,

रिश्तो के इमारत में दरार ,
राहों की रहस्यमयी भटकाव ,
अभी हार के बीच में
जीत की संभावनाए शेष है ,

मस्तिष्क के शिराओ का कसाव ,
चेहरे की फीकी मुस्कान ,
शेष है अभी आखों (मौन ) की भाषा ,
जीवन का मंचन शेष है
शेष का अवशेष में परिवर्तन
पूर्ण नहीं तो
अधिअंशत: शेष है ।

बहस

कई दिन से
बहस सिर्फ बहस
इस बात का
की सामने वाला
क्यों नहीं है मेरी
बात से सहमत

रविवार, 24 जनवरी 2010

जीवट

सारी दुनिया परेशान है ,
परेशान है जीने में ,मरने में ,
मरना उसे आता नहीं ,
और जीना उसे भाता नहीं
करते है जीने में ही मरने की कल्पना ,
और टोहते रहते है कब्र की दीवार ,
जिंदगी में भावनाओ में ,
यह सच है ,
जीने में कई बार मौत आती है ,
लेकिन मौत के बाद
जीवन ,
एक कही सुनी बात है ।

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

विरोध-(२)

व्यवस्थाओ के शिकंजे से जकड़ा ,
इस बंधन को तोड़ने को आतुर ,
पल-पल विकराल होती समस्याओ
से घिरा मन ,
व्यवस्था को तोड़ने के लिए ,
निकलता है घर से,
पाता है बाहर भीड़ ,
बह जाता है उसी में ,
बन जाता है रैली ,
उसकी सारी कुंठाए ,
विरोध ,शक्ति आ जाती है ,
एक झंडे व् बैनर तले ।

सोमवार, 11 जनवरी 2010

अवलोकन

दोनों हमउम्र
एक ही माहौल में पले-बड़े
लगभग एक ही सी
उनकी दिनचर्या
कुछ बातों को छोड़ कर
एक दूसरे से सहमत
एक रात वें कर रहे थे
अपने sukh dukh का विश्लेषण
एक ने इसे जीवन कहा ,दूसरे ने इसे प्रपंच .

हकीकत

जिन्दगी में मैंने कुछ भी
बिगाड़ना नहीं चाहा
लेकिन जो बिगड़ गया
उसे संवारने की इच्छा भी नहीं हुई ,
ये मेरा भम्र है या
मेरी पैनी दृष्टि
मुझे बिगड़ा रूप ही
ज्यादा वास्तविक लगा .