शाम कितनी भी सुहानी हो
वो रात होने का घोतकहै ।
भोर कितना भी धुंधला हो
वो दिन होने की निशानी है ।
शाम कितनी भी चहल पहल हो
वो तन्हाई के करीब है ।
भोर कितना भी स्वच्छ हो
वो दुनियादारी की पहल है ।
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
घर
घर
जहाँ जाने में झिझकते नहीं हम ;
न ही कोई संकोच ।
घर
जहाँ आने के लिए आमंत्रण
की जरुरत नहीं होती ।
घर
संसार में पनाह लेने की एक जगह ,
महकती खुशबू ,जानी पहचानी
सम्बन्धो का घेरा ,
एक सुकून ।
घर
मेरे न होने के खालीपन को
एक इंतजार से भरता हुआ ,
मेरी जरुरत
मेरा घर ।
जहाँ जाने में झिझकते नहीं हम ;
न ही कोई संकोच ।
घर
जहाँ आने के लिए आमंत्रण
की जरुरत नहीं होती ।
घर
संसार में पनाह लेने की एक जगह ,
महकती खुशबू ,जानी पहचानी
सम्बन्धो का घेरा ,
एक सुकून ।
घर
मेरे न होने के खालीपन को
एक इंतजार से भरता हुआ ,
मेरी जरुरत
मेरा घर ।
मूक दर्शक
दरक रहा था
क्षण -प्रतिक्षण
दीवार मेरे मन की ,
मै व्यथित
चुपचाप
रक्त में शांत प्रवाह लिए
क्षीण दर्शक बना रहा
एक काव्य रचना
हाथ में लिए ।
क्षण -प्रतिक्षण
दीवार मेरे मन की ,
मै व्यथित
चुपचाप
रक्त में शांत प्रवाह लिए
क्षीण दर्शक बना रहा
एक काव्य रचना
हाथ में लिए ।
शनिवार, 30 जनवरी 2010
मंचन
कही तो कुछ शेष है ,
हलकी ,धीमी व् शिथिल मंद -मंद
दबी पड़ी कही
अन्दर तक,
कुछ नहीं फिर भी बहुत कुछ शेष है ,
मन में दबी पड़ी ,बचपन की कल्पनाए ,
युवाकाल की प्रतिशोध की भावनाए ,
वर्त्तमान से अजेय रहने की
इच्छाए शेष है ,
शेष है अभी पूर्णता की परिभाषा,
रिश्तो के इमारत में दरार ,
राहों की रहस्यमयी भटकाव ,
अभी हार के बीच में
जीत की संभावनाए शेष है ,
मस्तिष्क के शिराओ का कसाव ,
चेहरे की फीकी मुस्कान ,
शेष है अभी आखों (मौन ) की भाषा ,
जीवन का मंचन शेष है
शेष का अवशेष में परिवर्तन
पूर्ण नहीं तो
अधिअंशत: शेष है ।
हलकी ,धीमी व् शिथिल मंद -मंद
दबी पड़ी कही
अन्दर तक,
कुछ नहीं फिर भी बहुत कुछ शेष है ,
मन में दबी पड़ी ,बचपन की कल्पनाए ,
युवाकाल की प्रतिशोध की भावनाए ,
वर्त्तमान से अजेय रहने की
इच्छाए शेष है ,
शेष है अभी पूर्णता की परिभाषा,
रिश्तो के इमारत में दरार ,
राहों की रहस्यमयी भटकाव ,
अभी हार के बीच में
जीत की संभावनाए शेष है ,
मस्तिष्क के शिराओ का कसाव ,
चेहरे की फीकी मुस्कान ,
शेष है अभी आखों (मौन ) की भाषा ,
जीवन का मंचन शेष है
शेष का अवशेष में परिवर्तन
पूर्ण नहीं तो
अधिअंशत: शेष है ।
रविवार, 24 जनवरी 2010
जीवट
सारी दुनिया परेशान है ,
परेशान है जीने में ,मरने में ,
मरना उसे आता नहीं ,
और जीना उसे भाता नहीं
करते है जीने में ही मरने की कल्पना ,
और टोहते रहते है कब्र की दीवार ,
जिंदगी में भावनाओ में ,
यह सच है ,
जीने में कई बार मौत आती है ,
लेकिन मौत के बाद
जीवन ,
एक कही सुनी बात है ।
परेशान है जीने में ,मरने में ,
मरना उसे आता नहीं ,
और जीना उसे भाता नहीं
करते है जीने में ही मरने की कल्पना ,
और टोहते रहते है कब्र की दीवार ,
जिंदगी में भावनाओ में ,
यह सच है ,
जीने में कई बार मौत आती है ,
लेकिन मौत के बाद
जीवन ,
एक कही सुनी बात है ।
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