apna sach

सोमवार, 1 सितंबर 2025

जीवन और हम

कभी चेहरे की मुस्कराहट के पीछे 

छिप जाते है हम ग़मों के साथ ,

और कभी 

जीवन के उलझते क्षणों में 

हसीं ही उबार लेती है हमें ,

जीवन में सुख दुःख तो आते रहते है ,

एक हमें ही ठहरना है 

एक वजूद के साथ। 

रंग

आसमान नीला नही है ,
     
             न ही समुद्र ,

सपने रंग बिरंगें नहीं होते ,

       न ही जिंदगी बदरंग।

डर

   भितर ही डर जाते  है 

             हम कहीं 

पैर  कहीं भी चल देते है 

             बस ठहरते नही है 

उस जगह व उस पल में ,


मन बार बार पलायन 

             करता है ,

खुद से व खुद में ही ,

आँखे शून्य में चली जाती है 

व विचार जड़वत। 

छत

   छत आसमान से बात करने 

                     की  जगह,

पेड़ो की ऊंचाई तक जाकर 

उनसे बात करने की जगह ,

मन को बादलों पर रख  कर 

साथ दूर तक विचरण करते रहना ,

             व

पक्षियों को उड़ते और डाल पर 

      बैठते देखते रहना 

सीमाएं सबकी अपनी है 


उड़े चाहे जितनी 

   पर 

आना यही है.

  


 

वक्त

वक्त फूलों की सुगंध की तरह है 

आसपास बस बिखर जाती है 


आप चाहे तो उसे अंदर तक 

 समाहित करे ,

आनन्दित हो ,

स्वयं को उस पल में जोड़ दे 

          या 

बस वहाँ से गुजर जाएं 


रविवार, 31 अगस्त 2025

संकेत

उसकी उपस्थिति ही ,
   उसकी अभिव्यक्ति थी 
बोलना ,
   उसकी  मौजूदगी की आहट
लिखना ,
    उसके होने की मान्यता 

स्वीकार्यता के इस खेल में ,
उसकी चुप्पी ,
एक विद्रोह था। 
   


दुविधा

दौड़ते दौड़ते लगा कि 
सारी दुनिया थमी हुई है 
          शांत है ,
बस मैं ही दौड़े जा रहा हूँ 

हाँ ,अब रुका हूँ थोड़ा 
कि आराम से देखूँ जरा 
क्या है आस पास 

सब भागे जा रहे जाने कहाँ 
हैरान परेशान 
और मैं ही हूँ  
पिछड़ते जा रहा हूँ सबसे