apna sach

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

विरोध-(२)

व्यवस्थाओ के शिकंजे से जकड़ा ,
इस बंधन को तोड़ने को आतुर ,
पल-पल विकराल होती समस्याओ
से घिरा मन ,
व्यवस्था को तोड़ने के लिए ,
निकलता है घर से,
पाता है बाहर भीड़ ,
बह जाता है उसी में ,
बन जाता है रैली ,
उसकी सारी कुंठाए ,
विरोध ,शक्ति आ जाती है ,
एक झंडे व् बैनर तले ।

सोमवार, 11 जनवरी 2010

अवलोकन

दोनों हमउम्र
एक ही माहौल में पले-बड़े
लगभग एक ही सी
उनकी दिनचर्या
कुछ बातों को छोड़ कर
एक दूसरे से सहमत
एक रात वें कर रहे थे
अपने sukh dukh का विश्लेषण
एक ने इसे जीवन कहा ,दूसरे ने इसे प्रपंच .

हकीकत

जिन्दगी में मैंने कुछ भी
बिगाड़ना नहीं चाहा
लेकिन जो बिगड़ गया
उसे संवारने की इच्छा भी नहीं हुई ,
ये मेरा भम्र है या
मेरी पैनी दृष्टि
मुझे बिगड़ा रूप ही
ज्यादा वास्तविक लगा .

बुधवार, 6 जनवरी 2010

प्रयास

उस बंद दरवाजे को खोलो ,
वह खुलेगा ,
वह वैसे बंद नहीं है ,
जैसे तुम्हारे हाथ ।