जब एक कह रहा होता है
और दूसरा सुन रहा होता है
तो ये उनकी आपबीती
रहती है
एक का अनुभव
दूसरे का भुगता रहा होता है
एक का डर
दूसरे की आशंका होती है
एक का सपना
दूसरे की आशा होती है
उनके बातचीत का दायरा
उन्ही तक सिमटा होता है
हम तुम से बात कर रहे
दोनों शख्स
जब तीसरे की बात करते है
तो निश्चय ही
वह आदमी
उनका मालिक रहता है
और वे
उनके मजदूर ।
बुधवार, 2 जून 2010
रविवार, 25 अप्रैल 2010
शाम से भोर तक
दूर से पास तक
एक आवाज आयी कांपकर
उस कम्पन में अहसास था
एक बिंदु की शक्ल में
अपनी तुच्छता को प्रकट कर
वो चली उधर
जिधर बिखराव था
उस बिखराव में कुछ
लय मिला
लय में कुछ नया नहीं
न वो तीव्र थी
न वो शुष्क थी
बस था यही कि दृश्य था
दृश्य भी अजीब था
वह बस एक भराव था
जो एक शून्य को उत्पन्न कर
एक शून्य से मिला गया
(यथार्थ से ही जन्मी एक वह कल्पना जिसमे अहसास व दृश्य होता है जो ह्रदय को एक लय देती है . एक आस व निरंतर बहने वाली लय जिसे ह्रदय न चाहते हुए भी समय के साथ बिसर जाता है और यही है शून्य का शून्य से मिलना )
दूर से पास तक
एक आवाज आयी कांपकर
उस कम्पन में अहसास था
एक बिंदु की शक्ल में
अपनी तुच्छता को प्रकट कर
वो चली उधर
जिधर बिखराव था
उस बिखराव में कुछ
लय मिला
लय में कुछ नया नहीं
न वो तीव्र थी
न वो शुष्क थी
बस था यही कि दृश्य था
दृश्य भी अजीब था
वह बस एक भराव था
जो एक शून्य को उत्पन्न कर
एक शून्य से मिला गया
(यथार्थ से ही जन्मी एक वह कल्पना जिसमे अहसास व दृश्य होता है जो ह्रदय को एक लय देती है . एक आस व निरंतर बहने वाली लय जिसे ह्रदय न चाहते हुए भी समय के साथ बिसर जाता है और यही है शून्य का शून्य से मिलना )
शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010
सार्थकता
जब मै बैचैन हो जाती हूँ
अपने आसपास के आवरण से
शोरगुल के बीच
शांति के लिए ह्रदय को
उदास जम्हाई लेते देख
यथार्थ के धरातल पर कल्पना
के उखड़ते पाव को सम्हालते हुए
बाजारी व्यवस्था को वितृष्णा
से नकारते हुए
खोजने लग जाती हूँ कुछ
जो उबार सके इस उदास
बोझिल व निरर्थक क्षण से
तब
माँ पकड़ा जाती है
चाय का प्याला
और मै ढूढने लग जाती हूँ
उसमे
रिश्तो की मिठास
वह चाय का प्याला
जिसे माँ थमा जाती है
अपनी बेटी के व्यग्र चहरे
को देख
कैफीन के सहारे सब कुछ भूल
पुन:
संसार का एक दिव्य दर्शन करने को
उतार जाती है मेरे गले के नीचे
और मै महसूस करने
लगती हूँ
उस जज्बात की सार्थकता
उस कप की सार्थकता
और एक सार्थक जीवन
के लिए
उस निरर्थक क्षण को
भूलने लगती हूँ
अपने आसपास के आवरण से
शोरगुल के बीच
शांति के लिए ह्रदय को
उदास जम्हाई लेते देख
यथार्थ के धरातल पर कल्पना
के उखड़ते पाव को सम्हालते हुए
बाजारी व्यवस्था को वितृष्णा
से नकारते हुए
खोजने लग जाती हूँ कुछ
जो उबार सके इस उदास
बोझिल व निरर्थक क्षण से
तब
माँ पकड़ा जाती है
चाय का प्याला
और मै ढूढने लग जाती हूँ
उसमे
रिश्तो की मिठास
वह चाय का प्याला
जिसे माँ थमा जाती है
अपनी बेटी के व्यग्र चहरे
को देख
कैफीन के सहारे सब कुछ भूल
पुन:
संसार का एक दिव्य दर्शन करने को
उतार जाती है मेरे गले के नीचे
और मै महसूस करने
लगती हूँ
उस जज्बात की सार्थकता
उस कप की सार्थकता
और एक सार्थक जीवन
के लिए
उस निरर्थक क्षण को
भूलने लगती हूँ
बुधवार, 21 अप्रैल 2010
अतीत
शांत था
और उस शांति में
कंकड़ फेकना
हलचल पैदा कर
उभार दिया वृत्त दर वृत्त
उभरती व ख़त्म होती
कल्पनाओ का घेरा
अंतत: धीरे धीरे ख़त्म
पर आज भी
अंतर्मन के तलहटी में
काई से ढके
सुरक्षित है वो फेके गए पत्थर
जो आंदोलित कर गए थे
मेरे अंतर्मन को
कुछ क्षणों व दिनों के लिए
और उस शांति में
कंकड़ फेकना
हलचल पैदा कर
उभार दिया वृत्त दर वृत्त
उभरती व ख़त्म होती
कल्पनाओ का घेरा
अंतत: धीरे धीरे ख़त्म
पर आज भी
अंतर्मन के तलहटी में
काई से ढके
सुरक्षित है वो फेके गए पत्थर
जो आंदोलित कर गए थे
मेरे अंतर्मन को
कुछ क्षणों व दिनों के लिए
शनिवार, 17 अप्रैल 2010
प्रतिफल
धान की फूटती बालियो
को देखते हुए
उसकी जड़ो में सरकते
पानी की तरह
हम अपने कर्मो के
प्रतिफलो का
हमेशा विस्तार देखते है
को देखते हुए
उसकी जड़ो में सरकते
पानी की तरह
हम अपने कर्मो के
प्रतिफलो का
हमेशा विस्तार देखते है
बुधवार, 14 अप्रैल 2010
अब नही
अब हम नहीं जाते
देवदरी ,राजदरी
वही जहाँ जंगल
अपनी हरी भरी हरीतिमा में
पक्षियों के कलरव में
पानी के झरनों में
कलकल बहती नदी के लहरों में
हमारे मन मस्तिष्क को
प्रकृति के साथ जोड़ते थे
हम मन्त्र मुग्ध हो के
देवदरी ,राजदरी या लखनियादरी में
चट्टानों पर बैठे
प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारते
निश्छल मन को मानवीय संवेदनाओ
से ओतप्रोत पाते
इन्ही जंगलो से हमें ,जानवरों के बीच
मानवीयता का बोध होता
पर अब हम नहीं जाते
वहां डरते है जाने से
क्योकि
अब वह नक्सल प्रभावित भूभाग है
शतरंज के बिसात में खुद को एक
मोहरे की तरह इस्तेमाल से बचाना चाहते है
दहशत फैलाने के लिए
अपनी मौत से डरते है
भय ,आतंक में हक़ की लड़ाई
और इसमे एक निर्दोष की जान
पक्ष ,विपक्ष की दुविधा से बचना चाहते है
और यह जंगल जो
न तो फुलवा की आबरू को ठेकेदारों व
वन रक्षको से नहीं बचा सका
और न ही हमारे जवानो को
नक्सलियों से
अपनी सघन व विहड़ आकार में
चुपचाप देखता रहा
गुनाहगारो को आगोश में लिए
अब इसकी भयावहता से
डर लगता है
नीरव व सुनसान पड़ी
ख़ामोशी से डर लगता है
वहां फैली पाशविकता
से डर लगता है
खुद को बचाने के लिए
अब हम वहा नहीं जाते
देवदरी ,राजदरी
वही जहाँ जंगल
अपनी हरी भरी हरीतिमा में
पक्षियों के कलरव में
पानी के झरनों में
कलकल बहती नदी के लहरों में
हमारे मन मस्तिष्क को
प्रकृति के साथ जोड़ते थे
हम मन्त्र मुग्ध हो के
देवदरी ,राजदरी या लखनियादरी में
चट्टानों पर बैठे
प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारते
निश्छल मन को मानवीय संवेदनाओ
से ओतप्रोत पाते
इन्ही जंगलो से हमें ,जानवरों के बीच
मानवीयता का बोध होता
पर अब हम नहीं जाते
वहां डरते है जाने से
क्योकि
अब वह नक्सल प्रभावित भूभाग है
शतरंज के बिसात में खुद को एक
मोहरे की तरह इस्तेमाल से बचाना चाहते है
दहशत फैलाने के लिए
अपनी मौत से डरते है
भय ,आतंक में हक़ की लड़ाई
और इसमे एक निर्दोष की जान
पक्ष ,विपक्ष की दुविधा से बचना चाहते है
और यह जंगल जो
न तो फुलवा की आबरू को ठेकेदारों व
वन रक्षको से नहीं बचा सका
और न ही हमारे जवानो को
नक्सलियों से
अपनी सघन व विहड़ आकार में
चुपचाप देखता रहा
गुनाहगारो को आगोश में लिए
अब इसकी भयावहता से
डर लगता है
नीरव व सुनसान पड़ी
ख़ामोशी से डर लगता है
वहां फैली पाशविकता
से डर लगता है
खुद को बचाने के लिए
अब हम वहा नहीं जाते
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
जीवन से विपरीत
मौत आयी तो
वजहें सामने आने लगी
कैसे कैसे व कब ,क्यों हुए
दुर्घटना से
हत्या से
आत्महत्या से
बीमारी से
बलात्कार से
मार से
मौत आयी तो
आंकड़े बोलने लगे
कहा कहा
कितने कितने गए
सुनामी में
भूकंप में
तूफान में
बाढ़ में
युद्ध में
मौत आयी तो
सरहदे बोलने लगी
कौन कौन
कहाँ कहाँ से थे
विदेश से
देश से
प्रदेश से
मौत का कोई रंग नहीं होता
कोई रूप नहीं होता
कोई भेद नहीं होता
कोई पता नहीं होता
बस कहे तो
जिन्दगी ही चली जाती है
यूँ ही ,सब छोड़कर
वजहें सामने आने लगी
कैसे कैसे व कब ,क्यों हुए
दुर्घटना से
हत्या से
आत्महत्या से
बीमारी से
बलात्कार से
मार से
मौत आयी तो
आंकड़े बोलने लगे
कहा कहा
कितने कितने गए
सुनामी में
भूकंप में
तूफान में
बाढ़ में
युद्ध में
मौत आयी तो
सरहदे बोलने लगी
कौन कौन
कहाँ कहाँ से थे
विदेश से
देश से
प्रदेश से
मौत का कोई रंग नहीं होता
कोई रूप नहीं होता
कोई भेद नहीं होता
कोई पता नहीं होता
बस कहे तो
जिन्दगी ही चली जाती है
यूँ ही ,सब छोड़कर
सदस्यता लें
संदेश (Atom)