apna sach

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

परिचय


तुम मेरा परिचय जानना चाहते हो
क्या कहूँ कि मै एक पत्ता हूँ
कभी हरा भरा और
कभी सूख कर गिरता हुआ ,
कभी लहराता हुआ और
कभी मूल से दूर जाता हुआ

क्या कहूँ कि मै एक जड़ हूँ
गहराइयो की ओर अग्रसर
मिटटी से मिला हुआ
कभी धरातल पकडे
और कभी उखड़ा हुआ
सार तत्व की खोज में लीन
एक ऊचाई को पकड़ा हुआ

क्या कहूँ कि मै एक तना हूँ
कभी झुककर नतमस्तक
कभी टूटकर गिरता हुआ
एक ऊचाई पाकर भी
बाधाओ में हिलाता हुआ
कभी बोझ लिए अरमानो का
कभी तत्वहीन लगता हुआ
मजबूत आलम्ब बन कर भी
शाखाओ में बटा हुआ

क्या कहूँ कि मै एक फूल हूँ
कभी खिलता हुआ और
कभी मुरझाता हुआ
कभी माध्यम बना नवीन जीवन का
कभी जीता जीवन खोता हुआ
कभी सुगन्धित व आकर्षित
कभी दिखावा करता हुआ
अल्प जीवन पाकर भी
जीवन को अर्थ देता हुआ
कभी बिखरा मै बहारो से
कभी काटों में खिलता हुआ

बुधवार, 2 जून 2010

जब वे बाते करते है

जब एक कह रहा होता है
और दूसरा सुन रहा होता है
तो ये उनकी आपबीती
रहती है
एक का अनुभव
दूसरे का भुगता रहा होता है
एक का डर
दूसरे की आशंका होती है
एक का सपना
दूसरे की आशा होती है
उनके बातचीत का दायरा
उन्ही तक सिमटा होता है
हम तुम से बात कर रहे
दोनों शख्स
जब तीसरे की बात करते है
तो निश्चय ही
वह आदमी
उनका मालिक रहता है
और वे
उनके मजदूर ।

रविवार, 25 अप्रैल 2010

शाम से भोर तक
दूर से पास तक
एक आवाज आयी कांपकर
उस कम्पन में अहसास था
एक बिंदु की शक्ल में
अपनी तुच्छता को प्रकट कर
वो चली उधर
जिधर बिखराव था
उस बिखराव में कुछ
लय मिला
लय में कुछ नया नहीं
न वो तीव्र थी
न वो शुष्क थी
बस था यही कि दृश्य था
दृश्य भी अजीब था
वह बस एक भराव था
जो एक शून्य को उत्पन्न कर
एक शून्य से मिला गया


(यथार्थ से ही जन्मी एक वह कल्पना जिसमे अहसास व दृश्य होता है जो ह्रदय को एक लय देती है . एक आस व निरंतर बहने वाली लय जिसे ह्रदय न चाहते हुए भी समय के साथ बिसर जाता है और यही है शून्य का शून्य से मिलना )

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

सार्थकता

जब मै बैचैन हो जाती हूँ
अपने आसपास के आवरण से
शोरगुल के बीच
शांति के लिए ह्रदय को
उदास जम्हाई लेते देख
यथार्थ के धरातल पर कल्पना
के उखड़ते पाव को सम्हालते हुए
बाजारी व्यवस्था को वितृष्णा
से नकारते हुए
खोजने लग जाती हूँ कुछ
जो उबार सके इस उदास
बोझिल व निरर्थक क्षण से
तब
माँ पकड़ा जाती है
चाय का प्याला
और मै ढूढने लग जाती हूँ
उसमे
रिश्तो की मिठास
वह चाय का प्याला
जिसे माँ थमा जाती है
अपनी बेटी के व्यग्र चहरे
को देख
कैफीन के सहारे सब कुछ भूल
पुन:
संसार का एक दिव्य दर्शन करने को
उतार जाती है मेरे गले के नीचे
और मै महसूस करने
लगती हूँ
उस जज्बात की सार्थकता
उस कप की सार्थकता
और एक सार्थक जीवन
के लिए
उस निरर्थक क्षण को
भूलने लगती हूँ

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

अतीत

शांत था
और उस शांति में
कंकड़ फेकना
हलचल पैदा कर
उभार दिया वृत्त दर वृत्त
उभरती व ख़त्म होती
कल्पनाओ का घेरा
अंतत: धीरे धीरे ख़त्म
पर आज भी
अंतर्मन के तलहटी में
काई से ढके
सुरक्षित है वो फेके गए पत्थर
जो आंदोलित कर गए थे
मेरे अंतर्मन को
कुछ क्षणों व दिनों के लिए

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

प्रतिफल

धान की फूटती बालियो
को देखते हुए
उसकी जड़ो में सरकते
पानी की तरह
हम अपने कर्मो के
प्रतिफलो का
हमेशा विस्तार देखते है

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

अब नही

अब हम नहीं जाते
देवदरी ,राजदरी
वही जहाँ जंगल
अपनी हरी भरी हरीतिमा में
पक्षियों के कलरव में
पानी के झरनों में
कलकल बहती नदी के लहरों में
हमारे मन मस्तिष्क को
प्रकृति के साथ जोड़ते थे
हम मन्त्र मुग्ध हो के
देवदरी ,राजदरी या लखनियादरी में
चट्टानों पर बैठे
प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारते
निश्छल मन को मानवीय संवेदनाओ
से ओतप्रोत पाते
इन्ही जंगलो से हमें ,जानवरों के बीच
मानवीयता का बोध होता

पर अब हम नहीं जाते
वहां डरते है जाने से
क्योकि
अब वह नक्सल प्रभावित भूभाग है
शतरंज के बिसात में खुद को एक
मोहरे की तरह इस्तेमाल से बचाना चाहते है
दहशत फैलाने के लिए
अपनी मौत से डरते है
भय ,आतंक में हक़ की लड़ाई
और इसमे एक निर्दोष की जान
पक्ष ,विपक्ष की दुविधा से बचना चाहते है

और यह जंगल जो
न तो फुलवा की आबरू को ठेकेदारों व
वन रक्षको से नहीं बचा सका
और न ही हमारे जवानो को
नक्सलियों से
अपनी सघन व विहड़ आकार में
चुपचाप देखता रहा
गुनाहगारो को आगोश में लिए

अब इसकी भयावहता से
डर लगता है
नीरव व सुनसान पड़ी
ख़ामोशी से डर लगता है
वहां फैली पाशविकता
से डर लगता है
खुद को बचाने के लिए
अब हम वहा नहीं जाते