apna sach

बुधवार, 17 अगस्त 2011

किस लोकत्रंत की बात हो रही है .ऐसे ही भीड़ को लेकर चुनाव करते है ,कुछ वोटो से आगे होकर संसद में बैठते है .उन्हें खुद ही नहीं याद रहता है कि चुनावी घोषणापत्र क्या था .सिस्टम खुद ही बनाते है ,उसमे हो रही कमी को कैसे वो नकार सकते है .अब क्या भष्ट्राचार की परिभाषा की जरुरत है .विश्व की महाश्क्तिवो को वीटो का अधिकार छोड़ने को कहा जाये तो वो कभी सहमत होगी .इसी प्रस्ताव पर वो वीटो का उपयोग करेगी . निसंदेह संसद बड़ा है तभी तो जनता चाहती है जनलोक पाल बिल संसद पटल पर आये की राष्ट्रपति अध्यादेश जारी करे .

बुधवार, 13 जुलाई 2011

ख़ामोशी



तुम  चुप  हो 
चुप्पी  में  भी एक ख़ामोशी
निरीह व हताश
लगभग मरी हुई सी
चुपचाप देखती हुई
कि बहुत लोग चीखते चीखते
अंत में शांत हो गए
हाँ ,हार गए

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

आत्मसात



ये काले स्याह बादल
अब बरसते ,तब बरसते
आसमानी छत को झुकाते हुए
हमें प्रकृति से
इस कदर जोड़ जाते है
कि
हम अन्दर तक कही रिक्त
हो जाते है
और विस्मित मन
कल्पनाओ में
बहुत दूर तक फैल जाता है
असीमित व
अद्वितीय बूंदों के साथ ।

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

डायरी

पन्ने पलटता गया वह
एक के बाद एक ,
रुक जाती थी नजर
किसी लिखे पन्ने पर ,
लेकिन उसे एक पृष्ठ
की खोज थी
जो उसे बैचैन कर दिया था
पलटता गया वह सावधानी पूर्वक
अंतिम पृष्ठ तक ,
अपना नाम
पुन: शुरुआत हुई
एक बार फिर अन्त हुआ
नहीं मिला वह ,
अबकी बार मिलेगा
वह पन्ना
चिन्ह अंकित कर देगा उस पन्ने पर
जब भी चाहे
मिल जाये वह ,
लेकिन ऐसे तो हर पन्ने की
जरुरत हो जाती है ,
तो क्या सभी पन्ने पर
निशान लगाना होगा ,
हाँ ,एक पन्ने पर कालम बनायेगा
लिख देगा शीर्षक ,एक शब्द
नीचे रहेंगे दिन व मास
विवरण रहेगा उन पलों का ,
लेकिन यदि ऐसा हुआ तो
कुछ पन्ने नहीं खुल पायेंगे
कुछ अजीब नहीं लगेगा उसे
क्योकि वह उन पन्नो को
पढ़ना नहीं चाहता
लेकिन खुल जाती थी
स्वयं वे पन्ने ,
पढ़ लेता था वह
उन्हें सरसरी निगाह से
खुद की नजरो से
नजरे बचा के ,
वह उन पन्नो को भूल जाता था कभी
हाथ स्वयं रुक जाते थे
उन अक्षरों पर
पढ़ लेता तभी वह अनजाने ही ,
वह उन्हें नहीं पढ़ना चाहता था
क्योकि उसे डर था मन में
कही शब्दों से विरक्ति न हो जाये
यदि हो गया ऐसा कभी
रूह चली जायेगी कही
डायरी रह जायेगी यही ।

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

परिचय


तुम मेरा परिचय जानना चाहते हो
क्या कहूँ कि मै एक पत्ता हूँ
कभी हरा भरा और
कभी सूख कर गिरता हुआ ,
कभी लहराता हुआ और
कभी मूल से दूर जाता हुआ

क्या कहूँ कि मै एक जड़ हूँ
गहराइयो की ओर अग्रसर
मिटटी से मिला हुआ
कभी धरातल पकडे
और कभी उखड़ा हुआ
सार तत्व की खोज में लीन
एक ऊचाई को पकड़ा हुआ

क्या कहूँ कि मै एक तना हूँ
कभी झुककर नतमस्तक
कभी टूटकर गिरता हुआ
एक ऊचाई पाकर भी
बाधाओ में हिलाता हुआ
कभी बोझ लिए अरमानो का
कभी तत्वहीन लगता हुआ
मजबूत आलम्ब बन कर भी
शाखाओ में बटा हुआ

क्या कहूँ कि मै एक फूल हूँ
कभी खिलता हुआ और
कभी मुरझाता हुआ
कभी माध्यम बना नवीन जीवन का
कभी जीता जीवन खोता हुआ
कभी सुगन्धित व आकर्षित
कभी दिखावा करता हुआ
अल्प जीवन पाकर भी
जीवन को अर्थ देता हुआ
कभी बिखरा मै बहारो से
कभी काटों में खिलता हुआ

बुधवार, 2 जून 2010

जब वे बाते करते है

जब एक कह रहा होता है
और दूसरा सुन रहा होता है
तो ये उनकी आपबीती
रहती है
एक का अनुभव
दूसरे का भुगता रहा होता है
एक का डर
दूसरे की आशंका होती है
एक का सपना
दूसरे की आशा होती है
उनके बातचीत का दायरा
उन्ही तक सिमटा होता है
हम तुम से बात कर रहे
दोनों शख्स
जब तीसरे की बात करते है
तो निश्चय ही
वह आदमी
उनका मालिक रहता है
और वे
उनके मजदूर ।